Monday, January 13, 2020

Teacher’s Speak


                                                                                   
मेरी कहानी मेरी जुबानी

श्रीकांत
नमस्कार मेरा नाम श्रीकांत है, मैं एक मिडिल क्लास फॅमिली से हूँ और साउथ दिल्ली में रहता हूँ | मेरी जिंदगी की शुरुआत तब होती है जब मैं 9th क्लास में था | मैं क्लास की सबसे पिछली सीट पर बैठता था और अपने टीचर से बहुत डरता था | 

मैं कभी किसी एक्टिविटीज में हिस्सा नही लेता था क्योंकि मुझे घबराहट होती थी | मैं अपने दोस्तों के साथ खूब मस्ती किया करता था,मेरा बहुत मन करता था की कभी मेरे लिए भी क्लास में तालियाँ बजे, मेरी भी क्लास में प्रशंसा की जाये और मुझे भी सब लोग स्कूल में जाने | मगर मुझमे अपनी बाते बताने  की हिम्मत नही होती थी | एक दिन मेरे दोस्त रंजित को मंज़िल के बारे में पता चला, उसने बताया की मंज़िल एक ऐसी जगह है जहा फ्री में मैथ्स  और कंप्यूटर पढ़ाया जाता है, मगर मेरे अंदर से पढ़ाई करने की इच्छा  नही थी इसलिए  मैंने उसे मंज़िल जाने के लिए इंकार कर दिया  | लेकिन मेरे भाई शशिकांत को पढ़ने में बहुत रूचि थी इसलिए उसने रंजित से बोला... “मुझे मंजिल में एडमिशन चाहिए” |  रंजित ने अपने भाई विक्की से मंज़िल का फॉर्म लाने के लिए कहा, मंज़िल में पहले से ही नियम था कि जिसके लिए फॉर्म लिया जा रहा है उसके नाम के फॉर्म से कोई दूसरा छात्र एडमिशन नही ले सकता और विक्की भाई को मेरे भाई की जगह मेरा नाम याद रहा और मेरे नाम लिखवा दिया गया, फिर मेरे भाई शशिकांत को जब यह पता चला तो उसने मुझसे बोला कि इस बार तुम एडमिशन ले लो मैंने ये सोच कर एडमिशन ले लिया कि मैं अपने भाई के लिए फॉर्म ले लूँगा  और फिर मंज़िल छोड़ दूंगा |

थिएटर क्लास 
तो दोस्तों यहाँ से शुरु  होती है मेरी मंज़िल की यात्रा !!
सबसे पहले मैंने मैथ्स फाउन्डेशन क्लास में एडमिशन लिया जिसके टीचर आशीष भईया थे  | क्लास के पहले दिन भईया ने सबको अपना परिचय देने को कहा | जब मेरी बारी आई तो मै बहुत डर गया और एक मिनट तक चुप रहा | फिर उसके बाद अटक-अटक कर मैंने अपने बारे में बताया| मगर मुझे यह बात बहुत अच्छी लगी कि आशीष भईया ने मेरा प्रोत्साहन बढ़ाया और मैं सब कुछ अपने बारे में अच्छे से बता पाया | धीरे धीरे मुझे मंज़िल में अच्छा लगने लगा और मज़ा आने लगा | क्योंकि वहां बहुत अच्छे से समझाया जाता था और हिमांशु भाई ने मुझे मेरी स्कूल की मैथ्स पढ़ाई, जिससे मेरा मैथ्स में परफॉरमेंस स्कूल में अच्छा होने लगा| मगर फिर भी मुझे अपनी क्लास में कुछ भी बोलने में डर लगता था, लेकिन  मुझे जहाँ मौका मिलता मैं वहां मंज़िल में एडमिशन ले लेता और हर सेशन में जाता | एक दिन मुझे मंज़िल उत्सव के बारे में पता चला मैंने उत्सव में वालंटियर किया, मगर आप विश्वास नही करेंगे कि मैंने कितना डर डर कर उत्सव में वालंटियर किया | मैंने उत्सव में पहली बार थिएटर प्ले देखा जिससे मैं आश्चर्यचकित रह गया | ये प्ले मेरी जिंदगी बदलने वाला एक पल बन गया | फिर मैंने फैसला किया कि अब मैं मंज़िल की थिएटर क्लास में एडमिशन लू |

थिएटर क्लास में एडमिशन लेने के बाद मैं हर एक्टिविटी में हिस्सा लेने लगा | मंज़िल थिएटर में मुझे अनिश भईया, अभिनव भईया और जय भाई यह सब लोग मेरा प्रोत्साहन बढ़ाते थे और मौके देते थे आगे बढने के लिए |  एक दिन मुझे पता चला कि 26 जनवरी को समारोह होने वाला है मेरे स्कूल में | अगर कोई कुछ भी परफोर्म करना चाहता है तो जल्दी अपना नाम दे | फिर मैने फैसला किया कि मैं अपने स्कूल में अपना नाटक करूंगा और मैंने अपने सर से बात की और अपने दोस्तों को लेकर नाटक की तैयारिया शुरू की| जब हमने अपना नाटक प्रस्तुत किया  तो  सभी लोगो को बेहद पसंद आया|  तब मैं ऐसा महसूस कर रहा था, मानो मैं अपने स्कूल का हीरो बन गया हूँ | ज़िंदगी में पहली बार मैंने अपने नाम की ताली बजती हुई सुनी जो एक अद्भुत लम्हा था मेरे लिए| तब से मुझे  स्कूल में हर कोई जानने लगा और मेरी प्रशंशा करने लगा|
मेरी 9th क्लास की परीक्षा हुई और सिर्फ चार बच्चे ही पास हुए, जिसमे तीन लड़किया थी और एक लड़का था, वह लड़का मैं था जो उन चार बच्चों में पास हुआ था | उस दिन मुझे अपने आप पर बहुत गर्व महसूस हुआ था क्योंकि 22 लड़कों में से केवल मैं अकेला वो लड़का था जो पास हुआ था और यह कीर्तिमान मैंने सिर्फ और सिर्फ मंज़िल की थिएटर क्लास की वजह से हासिल किया था | फिर मैं और भी ज्यादा समय थिएटर को देने लगा|

एक दिन मंज़िल में एक शोर्ट मूवी के ऑडिशन के लिए कुछ लोग आये और पूरे मंज़िल से लगभग 150 बच्चो ने अपना ऑडिशन दिया और यहाँ भी मैं सौभाग्यवश मैं चुना गया जो मेरे लिए गर्व की बात थी| ये शोर्ट मूवी समाप्त करने के बाद मुझे NSD के बारे में पता चला | वहां 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के साथ समर वोर्कशोप होने वाली थी | मैंने भी NSD की इस वर्कशॉप में एडमिशन लेने के लिए सोचा और यह भी जनता था कि यहाँ  हजारो की संख्या में लोग हर वर्ष आवेंदन करते है और मैंने भी आवेदन किया |  यहाँ भी मेरा एडमिशन हो गया और मैं और भी ज्यादा लगन व मेहनत से थिएटर करने लगा |

मेरी लगन और मेहनत को देखकर मुझे मंज़िल की थिएटर क्लास में (UT) यानि भविष्य में आने वाला टीचर बना दिया  गया | UT के दौरान मुझे पता लगा कि बच्चो को थिएटर सिखाने से मैं और सीख रहा हु और फिर केवल 15 वर्ष की उम्र में मैं थिएटर टीचर बन गया था |
स्कूल के समय में मैं अब अच्छे से स्कूल के हर कार्यकर्म में हिस्सा लेने लगा और अपने स्कूल के लिए पुरुस्कार लेकर आने लगा| और ऐसे ही मैंने 12th पास कर ली | अगर मेरी जिंदगी में थिएटर नही आया होता तो मैं 9th क्लास से आगे नहीं बढ़ पता और आज, मैं भी अपने स्कूल के बाकी लड़को की तरह नशे में पढ़ जाता| मेरे लिए अच्छी बात यह रही कि थिएटर ने मेरी जिंदगी बदलकर रख दी जैसे मुझे चाहिए थी |

12th करने के बाद मैनेपूरी मेहनत और लगन से थिएटर किया जिसमे मैंने खूब नाम कमाया  और अच्छे से कार्य किया | उसके बाद जैसे हर कलाकार की जिंदगी में उतार-चढाव आते है वैसे ही  मेरे सामने भी आये| आर्थिक स्थिति ख़राब होने के चलते मुझे फैसला लेना पढ़ा कि थिएटर छोड़कर अब मुझे नौकरी करनी चाहिए  और परिवार को support करना चाहिए| मगर मुझे सिर्फ थिएटर आता था, और उसके अलावा मुझे किसी भी प्रकार का अनुभव नही था | आख़िर कार बहुत कोशिश करने के बाद मुझे एक जॉब मिली कॉल सेंटर में | इस जॉब में मुझे देश के कौने - कौने में हर जगह के लोगो से बात करनी थी और जब मैंने यह जॉब शुरू की  तब मेरी तनख्वाह केवल 8 हजार रूपए थी, लेकिन मेरी मेहनत और लगन को देखकर मेरी तन्खवाह 15 हजार रूपए कर दी गई | यहाँ भी थिएटर की वजह से मुझे बहुत मदद मिली, जिससे मैं लोगों से बहुत अच्छे से बातचीत कर पाया और पहले महीने में ही मेरी तनख्वाह  24 हजार रूपए बनी | मैंने कॉल सेंटर में केवल तीन महीने ही जॉब की, क्योंकि मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि मैं यहाँ फंसता जा रहा हूँ फिर मैंने जॉब छोड़ने का फैसला किया और साथ ही साथ यह भी फैसला किया कि अब वापस मैं थिएटर ही करूँगा और इतने  पैसे भी कमाने है  कि जिससे घर का और मेरा अच्छे से गुज़ारा हो सके |

फिर मैं  निकल गया अपनी खुद की तलाश में, कि मैं थिएटर में ऐसा क्या करू जिससे में अपने और बहुत से ऐसे कलाकारों के लिए क्या करू जो पैसो की बजह से थिएटर छोड़ देते है कैसे मैं Sustainble theatre बनाऊ, फिर मैंने खुद की पिछली थिएटर यात्रा के बारे में सोचा की मैंने ऐसा क्या काम किया है जो मेरे इसमें काम आ सकता है तो मैंने पाया की मैंने 70% थिएटर बच्चो  के साथ किया है और मेरा ज्यादा  रुझान बच्चो के साथ काम करने में है और फिर यहाँ से मेरी ज़िंदगी ने फिर एक मोड़ लिया और मैंने अपने ही जैसे बच्चो के साथ काम करने का सोचा क्योंकि थिएटर ने मेरी ज़िंदगी को सकारात्मक रूप से बदला था | मेरे देश में बहुत सारे  मेरे जैसे बच्चे है जो अभी भी आपनी स्कूल  की life को ढंग से नही जी पा रहे है उनके लिए कुछ करने का सोच कर, मैं रवि भैया, अनुराग भैया और नेहा दी से मिलने लगा और  अपने  इस मिशन में मैंने जनवरी 2019 में अपनी एक टीम बनाई जिनकी सोच मेरे जैसी थी और आपनी थिएटर कंपनी की एक नयी shuruaat की| हमारी  टीम का नाम है ड्रामेबाज़ और हम अभी दिल्ली के 8 स्कूलों और NGO में काम कर रहे है जहा हमारे पास 300 बच्चे है| मैं दिल्ली सरकार की एक फ़ेलोशिप में भी काम कर रहा हूँ जिसका नाम है स्ट्रीट थिएटर एंड परफोर्मिंग आर्ट | मैं उम्मीद करता हूँ कि मेरी journey आपके लिए प्रेरणादायक रही होगी|  

धन्यवाद्
श्रीकांत, थिएटर टीचर, मंजिल






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